मेरा मन कहता है की वो शायद सिर्फ पैसे लेने नहीं आई थी.




मैं आज गया था उसके पास वो सब भुलाने को जो बुरे पल हमने जीये थे , देखा था और महसूस किया था. जिसकी वजह से हमारे बीच बातें होना बंद हो गयी थी.

मैं चाहता था की जो हुआ सो हुआ उसे भूल जाना चाहिए। फिर से दोस्ती की शुरुवात करनी चाहिए लेकिन मैं गलत था. बीते दो सालो में वो एक दम बदल गयी थी. जिसकी कामना भी मैं नहीं कर सकता। बुलाने पर पहले उसने पहले मना किया फिर पता नहीं क्या सोच कर उसने मैसेज किया और कहा की वो आ रही है।

वो आयी हमने बात किया जूस पिया कुछ बातें हुई दोस्त भी साथ थे तो इतने दिन बाद मिल रहे है ऐसा फील ही नहीं हुआ। लेकिन फिर कुछ देर बाद जब सब दोस्त एक एक कर के जाने लगे तो उसका भी जाने का समय हुआ. बातों में उलझा कर मैंने उसने रोकने की कोशिश की लेकिन शायद उसे इस बार मेरी बातों में नहीं उलझना था. ये मैंने उसकी आँखों के भाव में देख लिया था. इसलिए एक बार से ज्यादा उसे रोकने की कोशिश नहीं की.

घर जाने के बाद उससे मैंने जब एक बार माना कर देने के बाद फिर से आने की वजह पूछी तो उसने बताया की उसके कुछ पैसे मेरे पास उधार रह गए थे उसे ही लेने आयी थी. ये सुन कर मन धक्क सा रह गया. तब लगा की सच में बदल गयी है वो, वो अब वो दोस्त नहीं रही जिसका हाथ पकड़कर मैं उसे जबरजस्ती स्टेशन पर टाइम पास करने के लिए रोक लिए करता था.

आज वो सबके सामने दोस्त तो बन कर आयी थी लेकिन वो भी उस सोने के जेवर की तरह बन कर आयी थी जिसपर सोने का पानी चढ़ा हुआ था. जिसे जौहरी आसनी से पहचान सकता था. उसने कहा की आज हमारी दोस्ती में जो बकाया था जिसकी वजह से मैं तुमसे कभी कभी बात कर लिया करती थी आज वो बकाया भी मैंने ले लिया है और हम दोस्त नहीं है.
मेरा मन कहता है की वो शायद सिर्फ पैसे लेने नहीं आई थी.

मेरा मन हारा हुआ था,आँखों में शर्मिंदगी थी ये उसने शायद नोटिस कर लिया था लेकिन फिर भी वो नहीं पसीजी।

वो भी तस्वीर में दिख रहे वाहनों की तरह आगे चली गयी और मैं हमारे बीच की दूरी का सफर तय करने लगा.

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