स्वतंत्रता दिवस के मौके पर गुजरात के ऊना में दलित संगठनों ने बड़ी रैली की। रैली में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार ने उनकी मांग एक महीने के भीतर पूरी नहीं की तो वे राज्य में एक बड़ा रेल रोको आंदोलन करेंगे। उनकी मांग है कि सरकार राज्य में हर दलित परिवार को 5 एकड़ जमीन दे। इसके साथ ही वहां मौजूद लोगों ने गाय की चमड़ी उतारने के काम को छोड़ने का भी संकल्प लिया।
चलो मान लिया ऊना में हुए रैली का मूल उद्देश्य एक दम सही था। दलितों को रोजगार मिलना चाहिए।
लेकिन पाँच एकड़ जमीन की बात थोड़ा हजम नहीं हुई।
आज मुम्बई जैसे शहरों में चाहे वो ऊँची जाती का हो या निचली जाती का हो उसे एक छोटा सा घर लेने के लिए भी पता नहीं कितनी बार अपनी जेब टटोलना पड़ता है।
आज देश में हजारों करोड़ो लोग ऐसे है जिनके पास अपना खुद का घर नहीं है।
आखिर दलितों को ही क्यू जमीन दी जाए ?
देश में आर्थिक रूप से जितने गरीब लोग है चाहे वो ब्राहमण हो या दलित... सरकार को सबको एक रूप से देखना होगा।
आज स्कूलों और कॉलेज में ओपन कास्ट के लोगो को फुल फीस देना पड़ता है जब कि वहीँ शेडूल कास्ट के लोगो को बहुत कम फीस देनी पड़ती है। ये कैसी लोकतंत्र है भाई। जहा पर तो स्कूली जीवन से ही भेदभाव का पाठ पढ़ाया जाता है।
अगर ऊना के इस रैली में सिर्फ दलितों के लिए मांग की बात न हो कर देश के लोगो के लिए हित के लिए और देश में भेदभाव को मिटाने के लिए होता तो आज देश का आम नागरिक खुश होता। ये रैली भी आम रैलियों की तरह आम नहीं होती खास बन जाती।

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