अगर मैं लोकल ट्रैन में सफर-सफर करते मर जाता हूँ तो मेरे घर वालो को कितना मुआवजा दोगे मोदी जी।


       


ये लेख लिखने का मन नहीं था लेकिन लिखना पड़ा। मैंने ट्वीट भी किया था। लेकिन शायद आपके रेल्वे मिनिस्टरी ने जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। खैर कोई बात नहीं। इस बार मैं फिर से लिख रहा हूँ और शायद ट्वीट भी करूँगा। सरकार में आए आपको तीन साल से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है। ध्यान केंद्रित करने वाली बात ये है कि सत्ता में आते ही आपकी सरकार ने बजट पेश किया। जिसमें रेल्वे बजट भी है। ट्रैन में रोजाना सफर करने के  नाथे और भारतीय रेल्वे का एक कस्टमर होने के नाते मुझे शिकायत करने का हक़ है और मेरे शिकायत का निवारण करने का काम भी आपका है।

वैसे तो आप मेरे नौकर भी है। लेकिन आपका औदा मुझसे बड़ा है। वरना मजाल किसी नौकर की जो घर का काम किए बैगर इधर उधर घूमे।

अभी हाल ही मैंने ट्वीटर पर रेल मिनिस्टर सुरेश प्रभु जी को टैग कर एक ट्वीट किया था।
जिसमे मैंने लिखा था कि "ट्रेन का वेंटीलेटर काम नही करता है। जिस वजह से वो एक शो पीस है। कृपया इसका ख्याल करें।" खैर में एक स्क्रीन शार्ट इसके साथ लगा देता हूँ।


अब आप सोच रहे होंगे कि वेंटिलेटर बंद होने से मौत कैसे होगी। सर ट्रैन में इतनी भीड़ होती है कि अगर आप एक बार अपना हाथ ऊपर कर चूल्लो को पकड़ लो तो आने वाले एक घन्टे तक आप अपना हाथ नीचे नहीं कर सकते हो। यही नहीं जो ट्रैन में पंखे है वो तो साइड- साइड में ही हवा देते है ऐसे में हद से ज्यादा भीड़ होने और भीड़ में बीच मे फंसे होने पर अगर आप उम्मीद करें कि ट्रेन में जो वेंटिलर लगा है कम से कम सांस लेने में वो आपकी हेल्प करेगा।

लेकिन होता ये है कि मुंबई की सेंट्रल लाइन में जितने भी लोकल ट्रेन रेलवे डिपार्टमेंट चलता है। उन ट्रेनों के वेंटीलेटर या तो बंद होते या फिर खराब और ये समस्या मेरी नहीं है हर उस शख्स की है जो मुंबई लोकल में सफर करता है। लेकिन क्या करे आवाज़ क्यों उठाये क्योंकि उन्हें टाइम कहा है फालतू का वक्त जाया करने की। खैर छोड़िए अपने किसी रिश्तेदार को ही बोल दीजिए की एक दिन बिना सिक्योरटी कांफीडेंसिएल हो कर कुछ घंटे सफर कर ले।

चलो जाने दिजीए अब आगे बढ़ते है। बहोत देर से एक ही स्टेशन पर रुका था।

एक तो ट्रेनों में वैसे ही भीड़ होती है और ऊपर से वेंटनटीलेटर बन्द होता है। ऐसे में सांस लेने में दिक्कत होती है। जिसमे मारने के चांसेस बढ़ जाते है।

ऐसे में सवाल ये उठाता है कि न ही मैं ट्रैन के सामने कूद कर अपनी जान दे रहा हूँ न ही मैं लटक रहा हूँ न मैं चलती ट्रेन में कोई स्टंट बाजी कर रहा हूँ। लेकिन फिर भी अगर सफर के दौरान ट्रैन में मेरी मौत हो जाती है तो आप मेरे घर वालो को कितना मुआवजा दोगे।

देखिए अगर आप देगें भी तो 5 या 10 लाख देगे। इससे ज्यादा तो नही। इससे क्या होगा क्या वो ज़िन्दगी भर ज़ी लेंगे। क्या उनका बुढ़ापा इन रुपयों से कट जाएगा। अरे इतने में तो मुंबई में घर भी नहीं आते है। दरअसल आप लोग मुवावजे के तौर पर हमारी कीमत तय कर देते है। समस्या का निवारण करने की बजाए उसे जवालामुखी बनने को छोड़ देते हो। अगर मैं ज़िंदा रहा तो मैं उन्हें आपके दिए हुए रकम से ज्यादा रुपये और खुशियां दूँगा। इसलिए समस्या का निवारण करना सीखो मुआवजा दना मत सीखो।

बात यही खत्म नही हुई है ये सील - सीला आपके मन की बात की तरह आगे बढ़ता रहेगा। पहले इसे ठीक कीजिए।


By, Suraj Mourya

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