मैं इन्हें पैसे नहीं दूंगा बल्कि दुआ दूंगा।



मैं इन्हें पैसे नहीं दूंगा बल्कि दुआ दूंगा





मुंबई के लोकल ट्रेन में सफर करते वक्त अक्सर तुम्हें ये किसी न किसी मे डिब्बे में दिख जाएंगे। हम सब इनसे परिचित हैं। हम और हमारा समाज इन्हें किस नजरों से देखता है ये सब जानते है।

मैं मलाड स्टेशन से घर जाने के लिए ट्रेन में बैठा था। ट्रैन जैसे ही अंधेरी स्टेशन पहुँची की इनका एक झुंड ट्रैन में चढ़ गया और पैसे मांगना शुरू कर दिया। वैसे तो मैं बहुत कंजूस हूँ किसी को जल्दी पैसे देता नहीं हूँ। तो मैंने इन्हें भी पैसे नहीं दिए। और सच कहूँ तो पैसे के लिए इन्होंने जबरजस्ती भी नहीं की। मैंने इन्हें पैसे नहीं दिए लेकिन इनके लिए दुआ जरूर की। भले ही आज सरकारी कागज पर शायद इन्हें बराबरी का हक़ मिलता हो। लेकिन असल जिंदगी में तो हमे कुछ ओर ही देखने को मिलता है। मैं चाहता हूं कि कागज की चीज़ सिर्फ कागज पर ही न हो बल्कि उसे ऐक्शन में भी क्या जाए। इन्हें काम दिया जाए, नौकरी दी जाए, ये भी आफिस जाएं, ट्रैन चलाए, न्यूज़ रूम के हॉट सीट ये भी बैठे, ये भी मार्केट में सब्जी बेचे, प्लेन चलाए। इतना ही नहीं अगर ये सब होता भी है तो हम आम लोगो को इन्हें सम्मान भी देना चाहिए इन्हें हेय दृष्टि से न देखे|

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