आज काफी वक्त के बाद मैं अपने ड्राविंग रूम में फुर्सत से बैठा हुआ था। कॉर्पोरेट सेक्टर्स में संडे और सैटर डे का दिन आराम दयाक माना जाता है। तो हमने अपने बीजी लाइफ से आराम ले लिया था। जिंदगी के बॉस को एक अप्लिक्शन लिख दिया था कि भैया आज डिस्टर्ब न करना। आज मोर्निंग से मोबाइल ऑफ कर रखा था ताकि ऑफिस के दोस्तों का फोन न आए।
बैठ - बैठ बड़ी देर से मैं अपने ड्राविंग रूम को एकमिनानं से देख रहा था। देख रहा था कि कैसे किताबें न्यूस्पपेर्स के बीच छुप चुकी है। खैर मैंने कुछ हलचल करते हुए अपने ड्राविंग रूम की साफ़ - सफाई करनी शुरू कर दी। सफाई करते - करते बहुत सी काम की चीज़ें भी मिली और फालतू भी। जो काम की थी मैंने उन्हें सहेज कर अलमारी में रख दिया और फालतू चीजो को ड्राविंग रूम से गेट आउट का रास्ता दिखा दिया।
न्यूस्पपेर्स के ढेर में कुछ ऐसी किताबें भी मिली जिन्हें मैं अक्सर रातों में कभी - कभी ढूंढा करता था। अहह!!! गलत नहीं समझिएगा ये कोई ऐसी - वैसी किताब नहीं थी जैसा की आप समझ रहे है। ये किताब थी जिन्हें में अक्सर कॉलेज के दिनों में पढ़ा करता। हाँ दी थी किसी ने मेरे बर्थडे पर।
लेकिन देखो न, न समझ वक्त की तरह वो भी न समझ निकली। आज उसकी किताब तो है पर वो नहीं। वक्त का अपना दस्तूर है वक्त खुद भी बदलता है और हमे भी बदल देता है।
आज मैं उस किताब को एक बार फिर पढ़ रहा हूँ एक - एक शब्द वैसा ही है जैसा बिल्कुन 5 साल पहले था। लेकिन मेरे ख़यालात बदल चुके है। आज किताब को पढ़ते हुए मुझे ये आभास हो रहा है कि क्यों तुम बदल गयी क्यों नहीं तुम इस किताब में लिखे एक - एक शब्द की तरह रही।
मैं दोष सिर्फ तुम्हे नहीं दूँगा क्योंकि सच तो ये भी है कि मैं खुद भी बदल गया हूँ। हाँ मैं दिखने में आज भी वैसा हूँ पर मेरे ख्याल बदल चुके। लेकिन देखो न ये किताब आज भी वैसे ही है जैसे पहले थी। और ये चीख चीख कर कह रही है कि क्यों हम बदल गए।
Suraj Mourya (MSD)

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