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मुंबई के लोकल ट्रैन का परिवार
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मुंबई जैसे बड़े शहर में क्या आपने एक परिवार को जन्मे देखा है। .. मैंने देखा हैं मुंबई के लोकल ट्रेनों में। यू तो मुंबई की लोकल ट्रैन मुंबई के लोगो का जनजीवन हैं लेकिन फिर भी इन ही ट्रेनों में हर रोज एक नया परिवार जन्म लेता है। अजय जो की एक विद्यार्थी है जो पत्रकारीता में अपना लास्ट ईयर कर रहा हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही उसे IBN7 में इंटर्नशिप मिली है आज के दौर में बिना अनुभव के नौकरी कहा मिलती हैं भला, इंटर्नशिप एक अच्छा जरिया था नौकरी पाने का । इंटर्नशिप के लिए उसे रोजाना ट्रैन से करीब ६० किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। उसे तकरीब डेढ़ घंटे लगते थे दफ्तर पहुचं ने में। इस बीच वो ट्रैन में कभी अखबार पड़ता तो कभी कानो में एअरफ़ोन ठूस कर गाना सुनने लगता। इसी बीच वो ट्रेनों में ऐसे जंग खाए हुए चेहरों को भी देखता जिन्हे जबरजस्ती ट्रैन में चढ़ा दिया गया हो। परतुं इन सब के बीच उन्हें ऐसे लोग भी दिखाई देते थी जिन्हे देख कर वो बेहद खुश होता था। अजय का मानना ये था की मुंबई के लोकल ट्रेनों में भी एक परिवार जन्म लेता हैं अगर आप किसी लोकल ट्रैन के एक डिब्बे में रोजाना सफर करते हैं तो आपको मुंबई के लोकल ट्रेनों में बसे परिवार का हिस्सा होने में ज्यादा समय नहीं लगता हैं। ऐसा ही कुछ हुआ अजय के साथ भी जब दफ्तर के पहले दिन अजय ट्रैन में चढ़ा तो वो भी सभी लोगो के तरह दो सीटो के बीच में बचे जगह में जा खड़ा हुआ। अगला स्टेशन कल्याण (ट्रैन में लगे इंडिकेटर से आवाज़ आ रही थी ) चुकी अजय को दादर उतरना था तो वह वहीँ खड़ा रहा। अजय के सामने एक अंकल बैठे हुए थे जो अखबार में हर दिन आने वाले मजेंदार चुटकुलो को जोर से पढ़ कर उन सभी को सुना रहे थे जो उनके इर्दगिर्द थे। हर चुटकलों पर तालियों की बरसात होती या तो कम्मनेट्स की। खैर इसी बीच ट्रैन में लगे इंडिकेटर ने बार फिर से अनाउंसमेंट की अगला स्टेशन डोंबिवली, ट्रैन स्टेशन पर कुछ देर रुकी और फिर चलने लगी। .ट्रैन में चुटकलों और तालियों की आवाज़ में अब तक कोई कमी नहीं आयी थी। खैर अगला स्टेशन थाने था। इतने देर से खडे अजय को किसनी ने पीछे से एक्सक्यूमी कहते हुए कहा बैठ जाओ। एवज में अजय भी उस शख्स को शुक्रिया कह कर बैठ गया। अजय अपने पास बैठे अंकल से धीमी आवाज से पूछा की उस शख्स ने मुझे बैठने के लिए जगह क्यों दी और मुझे जगह देने के बाद खुद क्यों खड़े। इसपर उन्होंने कहा ये मुंबई के ट्रैन का कानून है कुछ देर बैठने पर खड़े लोगो को भी बैठने दिया जाता हैं। इसके बाद अजय ने फिर से एक सवाल कर दिया और कहा आप इतने देर से लोगो को चुटकुले क्यों सुना रहे थे क्या आप इन सभी को जानते हो क्या ? उन्होंने कहा हाँ, हम सभी एक दूसरे को जानते हैं।जब मैंने भी लोकल ट्रैन में रोजाना सफर करना शुरू किया था ना तब मेरे मन में भी इतने ही सवाल थे जितने आज तुम्हारे मन में हैं। हम सभी एक परिवार की तरह हैं ये परिवार एक हिन्दू का हैं ये परिवार एक मुश्लिम का है ये परिवार एक शिख का है ये परिवार एक भारतीय का हैं। आज इस ट्रैन में हम सब एक परिवार की तरह हैं ये बहुत बड़ी बात हैं हम एक ही ट्रैन में एक दूसरों को हर रोज देखते हैं इससे हम सब के बीच जो दूरिया थी वो धीरे धीरे खत्म हो गयी और तुम भी अगर रोज इसी डिब्बे मे आओगे तो तुम भी परिवार का हिस्सा बन जाओगे। वैसे ट्रैन के हर एक डिब्बे में एक परिवार होता है जो हांसी की ठहाके लगाते हुए दफ्तर इंतज़ार करते हैं। अगले दिन अजय पहले दिन की ही तरह उस ही डिब्बे में चढ़ा और चुटकुलो पर तालिया और कम्मनेट्स करने लगा............ सूरज मौर्या
Nice
ReplyDeleteThanku 😊
DeleteGood Experience,Ajay
ReplyDeleteA real non-fiction of ur daily life
Thanku Ankita
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