आज भी हर रोज की तरह मन्नू ने अपनी चाय की दुकान सुबह - सुबह ही खोल दी। रोज की तरह दुकान में ग्रहकों का आना जाना शुरू हो गया था। लगभग दोपहर के 12 बज रहे थे कि मन्नू के दुकान के आगे पुलिस की जीप खड़ी हो गई। जीप देख कर मन्नू हैरान हो गया वो डर गया था कि अचानक उसके दुकान के आगे पुलिस की जीप क्यों खड़ी है। फिर उसे लगा की हो सकता है उन्हें आस पास कोई काम होगा। लेकिन तब उस जीप से एक कांस्टेबल उतरा और वो मन्नू के पास आया और कहने लगा कि SP साहिबा को उससे कुछ काम है। मन्नू थोड़ा होश संभालते हुए कांस्टेबल से वजह तो पूछी जिसपर पर कांस्टेबल ने कहा कि उसे नहीं पाता।
कुछ देर सोचने के बाद मन्नू ने कांस्टेबल से कहा कि वो तैयार है SP साहिबा से बात करने के लिए। जिसके बाद SP साहिबा मन्नू के पास पहुँची और मन्नू से कहा कि उन्हें उससे अकेले में बात करनी है जहाँ शांति हो। मन्नू उन्हें अंदर वाले कमरे में ले गया और बैठने के लिए एक कुर्सी दी। SP साहिबा ने कांस्टेबल को जीप में जा कर बैठने को कहा। मन्नू खुद एक कुर्सी अपनी ओर खिंचता हुआ बैठ गया।
मन्नू ने बैठते हुए SP साहिबा से पूछा "क्या वो चाय लेगी ?" मन्नू को जवाब देती हुई SP साहिब ने " हाँ " कहाँ।
मन्नू छोटू को आवाज़ लगाते हुए उसे अंदर बुलाया औऱ उससे दो चाय अंदर और बाकी जीप में जितने लोग होंगे उन्हें चाय देने के लिए कहा।
चाय का आर्डर देने के बाद मन्नू ने थोड़ी सी हिम्मत करते हुए धीमी आवाज़ में SP साहिबा से पूछा कि क्या उसने कोई गलती कर दी है जो वो यहाँ पर आई है।
कुछ देर तक SP साहिबा ने जवाब ही नहीं दिया। लेकिन अपनी लंबी चुप्पी तोड़ती हुए उन्होंने मन्नू से पूछा कि '‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’
SP साहिबा की ये बात सुनते ही मन्नू चौक गया। थोड़ी देर तक सिर झुकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया। उस की पलकें भीगी हुई थीं।
उसकी आंखों में आँसू थे। उसके रोमटे खड़े हो गए थे उस हादसे के बारे में एक बार फिर सुन कर। वो आसमान की ओर देखने लगा और सोचने लगा। मन सालो पहले पीछे पहुँच गया था।
होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे। इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे। दुकान में ग्राहक भी न के बराबर ही आ रहे थे। मन्नू भी आलस के मारे बैठे बैठे झपकी ले रहा था। झपकी लेते लेते कब 1 बज गए उसे पता ही नहीं चला। जब उसने देखा कि 1 बज रहे है तब उसने दुकान बंद करने की सोची लेकिन तब दुकान के पीछे से आती आवाज़ों ने उसे पीछे जाने के लिए मजबूर कर दिया। मन्नू जैसी ही दुकान के पीछे पहुँचा तो उसने देखा कि 4 लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे। छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की।
मन्नू उन लड़कों को पहचानता था वो यही के लोकल नेताओं के आगे पीछे लगे रहते थे और उन नेताओं के लिए ही छोटे बड़े जुर्म में अंदर बाहर होते रहते थे। इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था।
मन्नू उस लड़की को उन दरिंदो से बचाने के लिए उन लड़को को धक्का देने लगा लेकिन उन लड़कों ने ईट मन्नू सर पर मार दी। जिसके बाद मन्नू बेहोश हो गया।
लेकिन जब मन्नू की आँख खुली तो तब अंधेरा हो चुका था। आँख खुलते ही मन्नू को उस लडक़ी का ख्याल आया। उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं। बच्ची शायद मर चुकी थी।
मन्नू दौड़ कर उसके दुकान पर गया और मेज से एक पर्दे जैसा कपड़ा उठा लाया और उस लड़की को उसमें लपेट लिया। पानी के छींटे मार कर उस लड़की को उठाने के लिए अनगिनत कोशिश करने लगा कि शायद वो ज़िंदा हो। लेकिन कई बार कोशिश करने के बावजूद लड़की ने कोई हलचल नहीं कि। लेकिन छींटा मारने की वजह से लडक़ी का चेहरा साफ हो गया था। लड़की का चेहरा देखते ही मन्नू उस लडक़ी को पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी। उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था। रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के दुकान के सामने से स्कूल जाती थी।
बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे मन्नू उस के घर की तरफ बढ़ चला। रात गहरा गई थी। लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी। शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई।
मन्नू को उस लड़की को अपनी गोद मे लिए हुए एक एक कदम आगे बढ़ा रहा था। उसके आँख में आंसू थे वो खुद को अपराधबोध महसूस कर रहा था उसे लग रहा था कि लड़की को उन दरिंदो से न बचा पाने की वजह से ही आज उस लडक़ी की ये हालात है। उसके लिए एक एक कदम चलना भारी हो गया था। वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए। कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा। वहां चीखपुकार मच गई।
मैंने देखा है कौन थे वो लोग। मैं कोर्ट में गवाही देने के लिए तैयार हूं। मन्नू ये कहता रहा पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
SP साहिबा कि कखारने की वजह से मन्नू यादों से बाहर आ गया।
"देखिए उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है।" SP साहिबा ने बताया।
मन्नू ने हैरानी से कहा कि मैडम उस केस को तो सालो बीत गए है और शायद उसके माँ बाप अपनी बेटी के गम को बर्दाश नही कर पाए और ये शहर छोड़ कर चले गए।
SP साहिबा ने कहा कि उन्हें पता चला है कि वो इस केस के चश्मदीद गवाह थे। और कोर्ट में भी बयान देने के लिए तैयार थे। SP साहिबा कि ये बात सुन मन्नू एक दम हैरान और उलझन में पड़ गया था।
‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ SP साहिबा ने कहा।
तब तक छोटू चाय लेकर आ गया। मन्नू सर नीचे कर के चाय सुड़कता चला गया।
‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो। मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था। बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है।’’
बच्ची को उसके घर वालो के हवाले करने के बाद से मैं अपने आप मे नहीं था मैं बहुत परेशान था। उस लड़की कक न बचा पाने का मलाल मुझे आज तक है। एक महीने बाद जब एक बार फिर मैं उस लड़की के घर गया तो वहां ताला लटका हुआ था और आस पास के पड़ोसियों से पूछने पर भी कुछ नहीं पता चला।
‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी। दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थे। और गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे।
‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं। इसी शहर में होंगे सब। उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे। मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं। मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं।’’
मन्नू को लगा कि चश्मे के पीछे मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं।
‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे। लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है।
‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं।
आज पहली बार किसी पुलिस वाले ने चाय के पैसे दिए छोटू ने टेबल साफ करते हुए कहा और मन्नू को लग रहा था कि आज सालो बाद मन का बोझ कुछ हल्का हो गया।
इस मुलाकात के बाद वक्त और दिन तेजी से बीतता गया और वो बल्तकारी जो अब अधेड़ हो चले थे उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई। मन्नू ने भी अपना बयान दर्ज करवा दिया।
अब मीडिया वाले भी इस खबर के पीछे लग गए थे।
सच का साथ देने की वजह से मन्नू को काफी धमकी भरे कॉल्स आने लगे। जिस वजह से मन्नू को पूरी पुलिस सिक्योरिटी दी गई। इस केस की सब से बड़ी बात ये भी थी कि SP साहिबा खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थी और हर पेशी में मौवजूद रहती थी।
कोर्ट की तारीखें जल्दी जल्दी पड़ रही थी। ऐसी ही एक पेशी में मन्नू ने लड़की की पिता को देखा तो उन दोनों की आंखे नम हो गई।
उस दिन कोर्ट खचा खच भरा हुआ था। बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी से आया हुआ था मालूम पड़ रहा था।
आरोपियों का वकील कोर्ट में जज साहब के सामने दिदिल देते हुए,"जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि मन्नू अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया।
चारों बल्तकारी अपने मुछो पर ताव मार रहे थे और अपने वकील के गले मिल रहे थे।
‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकने लगा।
पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे। चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे। तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं। चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी। मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।’’
सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं। जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कठघरे की ओर जा रही हैं। पूरे माहौल में सनसनी मच गई।
‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…
‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी। मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था।
‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे। इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था।"
‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें। कपड़े इस ने फाड़े थे। सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं।’’
एसपी साहिबा बोले जा रही थीं। अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं।
SP साहिबा के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी। रिपोर्ट में साफ लिखा था कि SP साहिबा को जान से मारने की कोशिश की गई थी।
SP साहिबा अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया।
दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’
‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी। होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झूलती रही थी। मुझे दौरे आते थे। इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था।’’
अब केस आईने की तरह साफ था। मन्नू की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। SP साहिबा उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी।
‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती।’’
मीडिया वाले SP साहिबा से मिलने को उतावले थे। वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई।
‘‘मन्नू ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था। मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था।
‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे। शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे। मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था।
‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी। आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की। मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ाथोड़ा मरते देख रही थी।
‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं। मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी। आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई। मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना। फिर मौका मिला इस शहर में आने का।
‘‘बहुतकुछ हमारा यहीं रह गया था। शहर को हमारा कर्ज चुकाना था। हमारी इज्जत लौटानी थी।’’
‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया।
‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों। गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह।
‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे। मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे।’’
असल मे हमें गुन्हा करने वालों के खिलाफ हमेशा शिकायत दर्ज करनी चाहिए। हाँ मानता हूँ कि हमारा समाज आज तक नहीं बदला है लेकिन अगर समाज को बदलना है तो इसकी पहली पहल हमे खुद से करनी चाहिए।
सालों पहले होली में SP साहिबा और उसके परिवार की इज्जत रौंदा गया था। आज होली नहीं थी पर फिर भी जब SP साहिबा मीडिया से बात कर रही थी तभी उन की मां ने एक पुडि़या अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया। और अब तक बेरंगो से जी रही ज़िंदगी को रंगों से भर दिया।
फ़ोटो क्रेडिट - The Health Site

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