वो लोग हमारे रिश्तेदार नही थे....।

                   वो लोग हमारे रिश्तेदार नही थे....।






जब रात में हम अपने मोबाइल में कैंडीकर्श खेलते है और उसमें बबल्स फूटने क़ि आवाज आती है न उस वक्त हमारे सैनिकों   के कानों में डायनामाइटस फूटने क़ि आवाज़ आती है, बोम्बस फूटने कि आवाज़ आती है। इसके बावजूद ये हिफाजत करते है हमारे घर कि, आपको पता है ये हमारे बच्चों कि हिफाजत करने के लिए अपने बच्चों से दूर रहते है।

और जब हम सब न्यूएअर कि पार्टी में मसबुल थे न उस वक्त ये पठान कोर्ट में हमारे मुल्क में कोई आंच न आ जाये उसकी तैयारी कर रहे थे। ये सिर्फ  इसीलिए लड़ रहे थे ताकी हमारा आने वाला नया साल  बहुत बेहतर और हिफाजत से गुजरे। और सबसे खूबसूरती वाली बात ये जिन घरों कि हिफाजत करते है न इनको मालूम ही नहीं होता है उन घरों में किस मजहब का इंसान है। हिन्दू है,  मुसलमान है, सिख है, ईसाई है, बस इनको ये होता है ये मुल्क हमारा घर है और इसकी हिफाजत करनी है।

और में सिर्फ अपनी ही मुल्क कि बात नहीं कर रहा हूँ मैं हर मुल्क के आर्मी ऑफिसर कि बात कर रहा हूँ जो अपने मुल्क क़ि हिफाजत करता है। उनको सलाम है मेरा वो जान लगा देते है अपने मुल्क को संवारने में लेकिन हैरत इस बात पर होती है जो असली हीरो होते है न हमारे उनकी न तो कॉलरटियुन होती है हमारे मोबाइल में न ही उनकी  फोटो का इस्तेमाल हम वालपपेर के लिए करते है। लेकिन अगर ये हीरो न हो तो फिर कोई भी हीरो नहीं है। एक गलत फैमी मैं आपकी और दूर कर दु हमारे हिन्दुस्तान में जितने आर्मी ऑफिसर्स है जितने फौजी है, आपको पता नहीं ये अंदाज़ा है या नहीं अगर वो अपनी जॉब छोड़ कर अपने घर वापस आ जाए तो जितने पैसे उनको मिलते है उतने पैसे वो किसी भी काम में कमा सकते है। इससे ये जहीर हो जाता है कि इनका मकसद पैसे कामना नहीं है।

इनका मकसद आपकी और मेरी हिफाजत करना है। रही बात इनकी कुर्बानी कि तो इनके परिवार से जाके पूछिये इनके बच्चे तरस जाते है कि पापा कब आयेंगे, एक माँ इस बात को तरसती रहती है कि कब एक साल पूरा हो और उसका बेटा घर आए। और इस बात की भी उम्मीद नही होती है क़ि वापस आएगा भी या नही। जब हमारी इंडियन क्रिकेट टीम जीत ती है तो हम पार्टी मनाते है फटाके जलाते है जोश में आ जाते है करना चाहिए। लेकिन असल में किसी भी बार्डर पर इन लोगो की जीत होती है न  तो हमे पता भी नही चलता और हम ध्यान भी नही देते। अगर इनकी जीत नही हुई न तो फिर हिन्दुस्तान में कुछ नही होगा।

पठान कोर्ट में जो आर्मी ऑफिसर शाहिद हुए है न उनके परिवार से जाके पूछियेगा वो परेशान तो है उन्हें याद तो करते है लेकिन उनमें जज्बा अब भी यही है कि घर में से किसी न किसी को आर्मी में भेजेगे ताकि हमारा मुल्क हिफाजत से रहे। जाते जाते एक सवाल छोड़ जाता हूँ इस बात को सोचियेगा जरूर कि जो लोग शाहिद हुए है वो लोग हमारे रिश्तेदार नही थे वो हमारे करीबी भी नही थे। लेकिन उसके बावजूद सबसे ज्यादा थे वो हमारे। जय हिंद

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